कोरोना काल का सबसे विभत्स और क्रूर घटनाक्रम - मजदूरों का पलायन

सरकार चाहे जो भी हो और जिसकी भी हो, उसकी नाकामी पर सवाल होनी चाहिए, ऐसी विषम परिस्थितियों में सरकार की बहुत बड़ी भूमिका होती है अतःहमसबों को अपनी भूमिका के आयाम को भी बड़ा करना होगा नही तो कॅरोना का ऐसा राजनीतिकरण होगा जिसमें अभी तो रेल भटका है आगे देश भटक जाएगा। आगे हमें सकारात्मक सोचना चाहिए और अपने हिस्से की पहल जारी रखनी चाहिए।

कोरोना काल का सबसे विभत्स और क्रूर घटनाक्रम - मजदूरों का पलायन
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भारत भूमि में रहने वाले हमसभी भारतवासी है यह एक राष्ट्र भाव है। कॅरोना के आगमन की उद्घोषणा भी राष्ट्रीय सरकार इसी विश्वास के साथ करती है कि वेशक उससे चूक हुई , पर अब ये लड़ाई समस्त देशवासी मिलकर लड़ेंगे और पूरी जनता सब्र के साथ इस अभियान का हिस्सा बन जाती है।बीतते समय के साथ जमात प्रकरण उद्घटित होता है, जबावदेही तय हो उससे पहले कॅरोना साम्प्रदयिक हो जाता है।सरकार के लिए सुखद स्थिति होती है जब दो सम्प्रदाय के पक्षकारो का आरोप -प्रत्यारोप मूल सवाल को बहा ले जाती है।

कॅरोना काल का सबसे विभत्स और क्रूर घटनाक्रम जिसमें लाखो श्रमयोधा घनघोर कष्ट की अनदेखी करते हुए पांव पैदल ही अपने घर के लिए कूच करते है और उस जत्थे में बच्चे, बूढ़े, बीमार और महिलाओं की दारुन दशा देखकर मानवता कराहने लगती है। भूख और लाचारी के आगे अभासी राष्ट्रबाद, जिसे बड़े सहेजकर पाला गया था खंड खंड हो जाता है।

मजबूर भटकते मजदूरों की व्यथा से कम सरकार की व्यथा नही थी जिसे अपनी नाकामी छुपाने की कोई जुगत नही सूझ रही थी।पलायन करते उस जनसैलाब को धर्म ,जाति और संप्रदाय में रेखांकित कर मुद्दा बनाना आसान नही था लेकिन ऐसे खेल में महारत होते हुए हार जाना भी मंजूर नही, फिर कॅरोना प्रान्तीय बना दिया जाता है। राष्ट्रीय आपदा अब प्रांतीय जवाबदेही बन जाती है।समस्त राष्ट्र में मजबूत सरकार की धमक रखने वाली सरकार, जनता के सवालों का विकेंद्रीकरण करने लगती है।

रेल और हवाई यात्रा का परिचालन विषुद्ध रूप से राष्ट्रीय विषय है और यदि उसमे राज्य की भूमिका कही से भी गतिरोध पैदा करता है, तो ऐसे आपातकाल में जनहित के लिए राज्य के अधिकार में कटौती करने का संवैधानिक विशेषाधिकार केंद्र के पास होता है अतः राज्य को दोषी ठहराकर जनता को भ्रमित करना और लाचार मजदूरों को अमानवीय तरीक़े से ढोना , सरकार की छद्म पराक्रमी छवि को लज्जित करता है।बेतरतीब तरीके से रेल और फ्लाइट का चलाया जाना जहाँ दो दिन की यात्रा पांच दिन में पूरी कराई जा रही हो,और उस बेबश यात्रियों की पीड़ा यदि बड़ा सवाल नही बन रहा तो यह हमलोगों की असंवेदनशीलता मानी जायेगी।

गरीब और गरीबी को हमने ही नही हमारी नई पीढ़ी ने इसतरह बेपर्द होते पहली बार देखा तो हम मध्यम वर्ग को सचेत हो जाना चाहिये कि हमारी स्थिति कोई स्थायी नही है । सरकार के फैसले और नीति का सीधा और बड़ा असर इसी वर्ग पर पड़ता है ।आप का मुखर रहना बहुत जरूरी है क्योंकि आपके सवाल और असहमति से ही सरकार दबाव में आती है।

विगत कई वर्षों से ऐसा देखा जा रहा है कि आप सवाल खड़े करने के बजाय जबाब बनकर सरकार का बचाव करते है, जिसका नतीजा है कि कमोबेश हर मोर्चा पर बिफल सरकार कैसे आपकी भावनाओं से खेलती है। आपको बड़ी चतुराई से तैयार कर दिया गया है कि आप अतीत में ही अपना वर्तमान और भविष्य तलाशे। वर्तमान में जीने और लड़ने की आदत डाल लीजिये, सरकार की नाकामी पर सबाल उठाइये चाहे आप उसके समर्थक ही क्यों नही है इससे आपका नागरिक बोध बचा रहेगा और समाधान भी हासिल होगा।

आगे कॅरोना का गरीबीकरण करने की तैयारी है जिसमे मध्यम वर्ग हासिये पर धकेल दिया जाएगा याद रखिये आपने साथ मिलकर ताली थाली पीटी है दीप जलाई है तो अब साथ मिलकर ही नकारा सरकार के लिए छाती पीटने की तैयारी कीजिये। यहाँ बंट जाने की भूल भारी पड़ेगा।कॅरोना के बहाने सरकार अपनी सारी पिछली नाकामी के लिए आपकी सहानभूति चाहेगी और एक बार फिर घोषित आर्थिक पैकेज मे अपना हिस्सा नहीं ढूढ़ पाने और बदहाली के वावजूद भी आप नतमस्तक हो जाएंगे क्योकि सरकार के मुखिया में आपको भगवान की छवि दिखाई गई है।समाज मे कई विभाजन रेखा खींच दी जाएगी ताकि सरकार विरोधी लड़ाई राष्ट्रीय नही बर्गीय होकर कमजोर हो जाय।

आप को याद होगा कि जब सरकार बड़े गर्व से घोषणा करती है कि, दो लाख प्रतिदिन स्वदेशी PPE किट व अन्य सुरक्षा उपकरण महीनों से उत्पादित हो रही है फिर भी यदि सभी कॅरोना वारियर को यह उपलब्ध नही है जिसके लिए राष्ट्रीय ताली पिटवाई जाती है तो यह समझना आसान होगा कि केंद्रीय सरकार आपकी सुरक्षा को लेकर कितनी संवेदनशील है। अब कॅरोना वारियर प्रान्तीय जिम्मेदारी बना दी गई है।

अब एक नया सगुफ़ा आत्मनिर्भरता का छोड़ा गया है जो मेक इन इंडिया का नया वर्जन है । पहले का शेर धराशायी है तो दूसरे का हश्र क्या होना है आप सभी पहले से जानते है। जब सरकार अपनी महत्वाकांक्षी योजना के तहत इतने वर्षों में एक आदर्श गांव और एक स्मार्ट सिटी नही बना पाई, वो भला समूचे भारत को क्या आत्मनिर्भर बनाएगी।ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार की सोच या नीति यही है कि जिस मनरेगा का उपहास भरी सदन में किया गया हो वही आज तारणहार है ,अपनी कोई स्पष्ट योजना ऐसी आपात स्थिति में भी नही है।