तरस नहीं तरजीह चाहिए।

आज जो हालात बना है जिसमे हुजूम के हुजूम लोग अपने-अपने घर की ओर बढ़े चले जा रहे हैं वे कौन है?

तरस नहीं तरजीह चाहिए।
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क्या ये सब अप्रवासी मजदूर ही है जिनकी रोजी रोटी तत्काल प्रभाव से खत्म हो गई है यदि आप सिर्फ यही सोचते है तो गलत है यह भारत का ऐसा सच है जिसमे भविष्य के भय से भटकता भारत दिखता है जो बदस्तुर जारी रहता है फर्क सिर्फ इतना भर है कि आज आप और हम अपने अपने घर मे महफूज बैठकर इसे  देखने को मजबूर है।ये वही लोग है जो ट्रेनों बसों और ट्रको में भर - भर कर देश के चुनिंदा सम्पन्न शहरो जैसे दिल्ली ,मुम्बई, पूना, अहमदाबाद जैसे शहरों मे अपनी आर्थिक आबरू को बचाने को उम्मीद लिए आते रहे है लेकिन हमने जो विकास का मॉडल बनाया है उसमें इनकी बेहतरी के लिए कोई जगह नही है।

ये लोग क्या आज इतने महत्वपूर्ण है,  जिन्हें दीवालों के पीछे ढककर उन्नत भारत की तस्वीर दिखाई जाती है।इस्तेमाल में आने वाला यह जीवित संसाधन आज उपयोगी नही रहा यह उतना चिंता का विषय नही है जितना की महामारी का संवाहक बनकर बड़ी आबादी को जोखिम में डालने का डर और ऐसा भय बिल्कुल जायज भी है लेकिन जरा आप और हम गहराई से सोच सकते है कि मात्र  भोजन और रैन बसेरा के बूते इन्हें इतने लंबे समय तक रोक कर रखा जा सकता है जबकि लॉक डाउन बेमियादी होने की आशंका उनके जेहन में घर कर गया हो।

रात के आठ बजे की घोषणा से भारत की जनता को साधने की जो परिपाटी चलाई जा रही है क्या आठ दिन पहले से मंथन करके ऐसी व्यवस्था नही कर सकते जिसमे समाज के अंतिम करि में खड़े लोगो को पूरी राहत दी जा सके ।आप सरकार हैं साहब ये मानना मुश्किल है कि आपसे संभव नही वो भी ऐसी स्थिति में जब आप दुनिया के अन्य देशों में फॅसे सुबिधा सम्पन्न लोगों की इतनी बड़ी तादाद को घर वापसी करा चुके है।

शायद इसमे भी आपने आनन -फानन में बरप्पन की नुमाइश के कारण लापरवाही बरती है जिसका खामिजाजा भारतीये भुगत रहे है।

ऐसा ही एक बाकया कल देखने को मिला जब हजार बसों को आनंद विहार  से खोले जाने की खबर से  किस तरह का जनसैलाब जान को हथेली में लेकर वहाँ पहुँच गई अतः यह ध्यान रहे कि थोड़ी भी लापरवाही कितना भयावह हो सकता है और आपका नेक मिशन फेल हो सकता है।

मैं कोई राजनीतिक दुराग्रह से कटाक्ष नही कर रहा हूँ, यह एक क्रूर सचाई है। यहाँ मैं एक सुझाब भी प्रेषित करना चाहूंगा कि यदि हो सके तो इस भटकते बेबश लोगो को राजधानी के अलावे बड़े शहरों के स्थानीय होटलों में रखने का इंतजाम कर दीजिए जहाँ वे आराम से सामाजिक दूरी के साथ रह भी लेंगे और उसके एवज में होटलों को थोड़ी बहुत रकम मिल जाएगी जो होटल इंडस्ट्री के लिए बेल आउट पैकेज होगा। शायद सुझाव अप्रत्याशित लगे लेकिन जरा सोचिए इस समय क्या प्रत्याशित हो रहा है।

जनता एहतियात बरते यह निहायत जरूरी है लेकिन सरकार के स्तर पर यह बहुत जरूरी है कि मात्र सम्बेदना नही सरोकार रखिये भावी आपदा से लड़ने के लिए । स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी पुख्ता कर दीजिये की स्वास्थ्य कर्मियों के साथ हमलोग भी इस वार ताली और थाली आपके आभार स्वरूप बजाये।